फ़ितूर (ग़ज़ल संग्रह ) वैभव बेखबर FITOOR GAZAL SANGRH (KAVI-VAIBHAV BEKHABAR) KANPUR
शायर की क़लम से....... बचपन से व्याप्त तमाम कलाओं में सृजनात्मकता भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी जीवन में, ग्रामीम परिवेश में एक ग़रीब किसान का पुत्र होना दुख की बात नहीं थी,परिवार और परिवेश का हर व्यक्ति के जीवन में गहरा प्रभाव होता है इंटरमीडिएट करने के बाद थोड़ी निराशा हुई क्योंकि अब आगे के सफ़र के बारे में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं था,दिशा और क्षेत्र का कोई ज्ञान नहीं था कुछ करने का ज़ुनून मुझे गाँव से कानपुर शहर ले आया ग्रेजुएशन के दौरान शहर के तमाम रचनाकारों से मुख़ातिब हुआ और मेरी क़लम में रवानी आई, और मैंने ख़ूब लिखा ,बीच बीच में कई दफ़ा परिस्थितियाँ लडख़ड़ाईं तो मैंने जीविका के लिए कम्पनी में नौकरी कर ली, ग्रेजुएशन के आख़िरी वर्ष तक मुझें लेखनीय से एक महबूबा की तरह मुहब्बत हो गई लेक़िन इस मुहब्बत से फ़िलहाल जीविका नहीं चलने वाली थी, इसी समय मेरा मन बहुत विचलित रहा,भविष्य के लिए मैं कोई रास्ता नहीं खोज़ पा रहा था लेकिन इन्ही परिस्थितियों में मैंने ज़िन्दगी को बड़े क़रीब से महसूस किया, शाइरी में न कोई उस्ताद मिला ,न ही मैंने बनाना चाहा ,भटकने का सिलसिला पांच छह वर्ष चलता रहा ,साथ ही साथ लेखनी...