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sher, vaibhav katiyar

नफरतों ने तलवारें और बंदूके बनायीं होंगी मुहब्बत तो ज़हर भी मीठा के देती है लौटकर जब परिंदा घर आया शाम को वो पेड़ ही न रहा,आशियाना जिसपे था , वफाये सिसक रहीं हैं बंद कमरों में और बेवफा फिर नये शिकार की तलाश में है तुम ज़मीर बेचकर शर्मिदा हो बेखबर लोग खुश हैं यहाँ अखबार बेचकर राह है मंजिल है सलामत है पैर भी बेखबर हम खुश हैं तुम्हारे बगैर भी अगर मुह्हबत हो कलम से चले आइये ये दिल आशिकी के काबिल न रहा तमाशा सब मुक्कदर के दौर का है जो कल था मेरा आज किसी और का है उस दरिया का कुछ पता नही अब तो गज़ले प्यार बुझाती हैं तमाम मसाइलों पर बात करनी थी वरना हम तुमको भी लिखते ग़ज़ल की तरह, अवाम को रोटी के लाले पड़े और सियासी,मुल्क खा रहे हैं दिल देखता झूठे   ख्वाब कब तक ग़मों पर रखता नकाब कब तक खा ही लिया आज ज़हर बेखबर वो पीता आखिर शराब कब तक लाख ज़तन कर डाले तुम्हे भूलने के फिर याद करना ही मुनासिब समझा दौलत है तो मिल जायेगा अब इश्क यहाँ व्यापर   है कीचड़ में खज़ाना ढूढ़ लेंगे पीने वाले मयखाना ढूढ़ लेंगे अगर त...

ग़ज़ल संग्रह (new 97 gazal ) शायर/कवि- वैभव बेखबर

1 ख़ुशी  मिली कभी  दर्द बढ़ा  किसी का बराबर नहीं रहता  फ़लसफ़ा  किसी का बदलते रहते हैं  यहाँ  मंज़र मुसलसल सर किसी का ,कभी पत्थर  किसी का कोई जंग  जीतना  एक अलग बात है जीतना  मुश्किल है  भरोसा किसी का अगर कर नहीं सकते, मदत किसी की कभी कम नहीं करना,हौसला किसी का डूबता है  कोई  पार  जाता  है बेखबर समन्दर नहीं होता , दुश्मन  किसी का; 2 अपना  बनावटी  जलवा  दिखाने के लिए अब चिराग ज़लाते हैं लोग बुझाने के लिए फिर  तमाम  फर्जी  वादे  लेकर  आएगा सियासी चालचलेगा सत्ता हथियाने के लिए यहाँ सरकारें  भी सौदा ,कर  लेती है अब ग़रीब मोहताज़ रहता  दाने दाने  के लिए हुआ ये, रहजनों का सबक ,काम आ गया यहाँ रहबर तो  थे सब ,भटकाने  के लिए ग...