sher, vaibhav katiyar


नफरतों ने तलवारें और बंदूके बनायीं होंगी
मुहब्बत तो ज़हर भी मीठा के देती है

लौटकर जब परिंदा घर आया शाम को
वो पेड़ ही न रहा,आशियाना जिसपे था ,

वफाये सिसक रहीं हैं बंद कमरों में
और बेवफा फिर नये शिकार की तलाश में है

तुम ज़मीर बेचकर शर्मिदा हो बेखबर
लोग खुश हैं यहाँ अखबार बेचकर

राह है मंजिल है सलामत है पैर भी
बेखबर हम खुश हैं तुम्हारे बगैर भी

अगर मुह्हबत हो कलम से चले आइये
ये दिल आशिकी के काबिल न रहा

तमाशा सब मुक्कदर के दौर का है
जो कल था मेरा आज किसी और का है

उस दरिया का कुछ पता नही
अब तो गज़ले प्यार बुझाती हैं


तमाम मसाइलों पर बात करनी थी वरना
हम तुमको भी लिखते ग़ज़ल की तरह,


अवाम को रोटी के लाले पड़े
और सियासी,मुल्क खा रहे हैं


दिल देखता झूठे  ख्वाब कब तक
ग़मों पर रखता नकाब कब तक
खा ही लिया आज ज़हर बेखबर
वो पीता आखिर शराब कब तक


लाख ज़तन कर डाले तुम्हे भूलने के
फिर याद करना ही मुनासिब समझा

दौलत है तो मिल जायेगा
अब इश्क यहाँ व्यापर  है


कीचड़ में खज़ाना ढूढ़ लेंगे
पीने वाले मयखाना ढूढ़ लेंगे
अगर तुझे जाना है   तो जा
हम अपना ठिकाना ढूढ़ लेंगे


कुच्छ इस कदर बसे हो तुम मेरी नजरो में
खुद को भूल गये होते गर आइना न होता


उसे भुला चूका हूँ ,मैं ये जानता हूँ मगर
याद भी तो कुछ नहीं आता ,उसके सिवा   

जो मंजिल का सफ़र था ,जाने क्या हुआ
अब तेरी ओर ही लता है हर रास्ता मुझे

दुनियां तो चाहती थी अदाकार बनाना
एक हम ही न बदल सके किरदार अपना

गर मालुम होती मेरे ज़ख्मों की गहराई
ज़हर लेकर आते तुम,मरहम की जगह

बेखबर ,बेवजह दिल की ज़मी ,बंज़र मत करना
उसे जाना कहीं और हैं ,तेरा ठिकाना कहीं और है


गर निकल आये तो घर के मंदिर में लगाऊ
जो तेरी तस्वीर आखों में बसा रक्खी है

ज़ुल्म करके ज़ुल्म का हिस्सा नहीं होने देते
ज्यो रईश ,महगाई को सस्ता नहीं होते देते
बुराएयों को बहुत देते है बदुआयें भी
लोग ही यहाँ,अछ्चे हो अच्चा नहीं होने देते



ढल गयी ये उम्र भी  वक़्त से पहले कुछ
जिम्मेदारियों ने बाप को बुढहा बना दिया


ख़त्म हो गयी तुझे पाने की चाहत
इक्ष में कुछ बचा भी अब खोने को

असाढ़ सावन की बरसात तुम्हारे घर आई
और हम करते रहे गुज़ारा बूंदा बांदी से  

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