ग़ज़ल संग्रह (new 97 gazal ) शायर/कवि- वैभव बेखबर
1
ख़ुशी मिली कभी दर्द बढ़ा किसी का
बराबर नहीं रहता फ़लसफ़ा किसी का
बदलते रहते हैं यहाँ मंज़र मुसलसल
सर किसी का ,कभी पत्थर किसी का
कोई जंग जीतना एक अलग बात है
जीतना मुश्किल है भरोसा किसी का
अगर कर नहीं सकते, मदत किसी की
कभी कम नहीं करना,हौसला किसी का
डूबता है कोई पार जाता है बेखबर
समन्दर नहीं होता , दुश्मन किसी का;
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अपना बनावटी जलवा दिखाने के लिए
अब चिराग ज़लाते हैं लोग बुझाने के लिए
फिर तमाम फर्जी वादे लेकर आएगा
सियासी चालचलेगा सत्ता हथियाने के लिए
यहाँ सरकारें भी सौदा ,कर लेती है अब
ग़रीब मोहताज़ रहता दाने दाने के लिए
हुआ ये, रहजनों का सबक ,काम आ गया
यहाँ रहबर तो थे सब ,भटकाने के लिए
गरीबों को न्याय ,अब ख़ुदा भी नहीं देता
और पैसा चाहिए , कचहरी थाने के लिए
लौट के ही ना आये , माँ बाप के चिराग
शहर को गए थे बच्चे , कमाने के लिए
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यहाँ बेच बेच कर अच्छाइयों को
लोग छू रहे हैं ऐसे उचाईयों को
एक दूजे को ही गिराने के खातिर
अपने ही खोद रहे हैं खाइयों को
सैकड़ा,हजारा,की चाहत है पर
दहाई से ही प्रेम नहीं इकाइयों को
दौलत का दानव,सवार है सर पे
जायदाद लड़ा रही सगे भाइयों को
अपनी महफ़िल के लायक न समझा
तो अब छेड़ न मेरी तन्हाइयों को
मैं एक पर्वत बना के ही छोडूंगा
इसलिए जोड़ रहा हूँ राईयों को
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निति और नियति को डसते हुए
बाज़ार मंहगे ,आदमी सस्ते हुए
कोई किसी के ग़म की थाह न ले
लोग मिलते हैं अक्सर हसते हुए
घर चू रहा था,किसान का ,पर
उसे बादल अच्छे लगे बरसते हुए
मंजिले और दूर हो गयीं ,जब
आने जाने के तमाम रस्ते हुए
लोग घर बनाने वाले बेख़बर
देखें है एक घर को तरसते हुए
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अकेला ही सही चिल्ला रहा हूँ
इन्कलाब की आवाज़ उठा रहाहूँ
एक दिन बुलंद भी हो जाएगी
अभी बुनियाद अपनी बना रहा हूँ
चाँद सितारे न मिले तो न सही
ज़मीं को बंजर होने से बचा रहा हूँ
सच के सीने में नये इरादों का
एक नया जज़्बा जोश जगा रहा हूँ
कल मझ्धारों से लड़कर पार जाऊँगा
माना अभी लहरों से टकरा रहा हूँ
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अब झूठों का करे बहिस्कार कोई
सच का चलता नही कारोबार कोई
रोज,हवसी शैतानी ,खबर आती है
उठाकर देख लो तुम अख़बार कोई
सिर्फ़ बेहुनर लोग ही डूब रहे हैं
समन्दर में नहीं है मझधार कोई
अमीरी,ज़श्न का बहाना ढूंढटी है
मुफलिसी मना न पाए त्यौहार कोई /
इंसानियत को बाट रही ही बेख़बर
गिरा दे ये मज़हबी दीवार कोई ./
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छोड़ भी दे इन किनारों को
अब थाम ज़रा पतवारों को
निकलो तो तुम सूरज जैसे
भागना पड़ेगा अंधियारों को
बुनियाद में दम-खम रखते तो
गिरना न पढ़ता मीनारों को
निर्धन को कुछ धन दे मौला
ख़ुशी दे ग़म के मारों को
मांगने से भीख भी न मिले
छीनना पढ़ेगा अधिकारों को
फूहड़पन कर रहे हैं बेख़बर
कुछ फ़न सिखा फ़नकारों को ,
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चिल्लाना किसी को गवारा नहीं
होता ख़ामोशी से अब गुज़ारा नहीं
दूसरों की चीज़ पर नज़र तेरी क्यों
जब तुम्हारा ही सबकुछ तुम्हारा नहीं
सदा ज़मीनी फ़ितरत बनाये रखना
होता फ़लक पे किसी का गुज़ारा नहीं
ये हुनर ही अक्सर काम आता है
यहाँ किस्मत का कोई सहारा नहीं
गैरों का हाथ मिलाने से क्या होगा
जब अपनों के ही बीच भाईचारा नहीं
तमाम भवरें है ज़िन्दगी के सफ़र में
मिले मौत से पहले कोई किनारा नहीं
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कभी कुछ होता नहीं घबराने से
बात बिगड़ी भी बनती है बनाने से,
माना कभी सच नहीं हो सकता
पर झूठ छिप सकता है छिपाने से,
मंज़िल मिलती न कोई सफ़र होता
राह में चारों तरफ़ क़दम बढ़ाने से,
अक्सर बुज़दिल लोग ही टूट जाते हैं
हुनर तो निखरता है ठोकर खाने से,
पुन्य मिले नहीं पूजा पाठ से बेख़बर
और न ही पाप धुलें गंगा नहाने से;
10
ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
आसमां संग ज़मीं को लुभाये कोई
अब सितारा नया जगमगाये कोई
तोड़कर जातिवाद के बंधन यहाँ
सबक इंसानियत सबको पढ़ाये कोई
मैली सी हो गयी है सूरत जिनकी
उन आइनों को आइना दिखाये कोई
इससे पहले कि ,ये बंज़र हो जाए
इस मिटटी में दरिया बहाये कोई
देख दलालों को ,संसद कह रही
अब गरीबों का मसीहा आये कोई
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बचपन बुढ़ापा और जवानी से बढ़कर
ज़िन्दगी कुछ नही जिन्दगानी से बढ़कर
ये दिखायेंगें सब अपना अपना तमाशा
किरदार कोई नहीं कहानी से बढ़कर
छीन लेती है ये सारा सुकून जि़न्दगी का
बीमारी होती नहीं बदगुमानी से बढ़कर
बदगुमानी=शक
छलकाता रहा कोई पैमाने मैकदो में
अश्क़ पिये हैं किसी ने पानी से बढ़कर
किसी बहाने से जब तुम आओ छतपर
रात महकने लगे रातरानी से बढ़कर
कोई ज़हर,कभी अमृत होता तो कैसे
इश्क़ हुआ न मीरा दीवानी से बढ़कर।
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ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
बहर= मुफ़ाईलुन फालुन मुफ़ाईलुन मुफ़ा
चला आये'गा रब बुलाओ इक दफ़ा
दिया सच्चे दिल से जलाओ इक दफ़ा
बड़ी ज्यादा लगती मगर होती नहीं
मुसीबत से न'ज़र तो मिलाओ इक दफ़ा
सरल तुम्हा'रा भा'र भी होने लगे
कभी बोझ कि'सी का उठाओ इक दफ़ा
कभी घुट घुट कर ज़िन्दगी जीना नहीं
बहुत अच्छा हो कि म'र जाओ इक दफ़ा
असम्भव मन्ज़िल को ई अब होती नहीं
इरादा चलने का बनाओ इक दफ़ा ।
१३
सरल स्वभाव था कैसे क्रूर हुये लोग
जाने किस नशे में मग़रूर हुये लोग
सेवक शासन करने लगे जनता पर
सरकारी दफ्तरों में मज़बूर हुये लोग
माली को बाग़ का सलीका बता रहे
ताड़ी पर चड़कर खज़ूर हुये लोग
कि फ़ैला रहे हैं अँधेरा ही अँधेरा
किन क़िताबों को पढ़के नूर हुये लोग
कुछ अपनी ईमानदारी पर मिट गये
कुछ,चालाकियां करके मशहूर हुये लोग
वहसीपन में आदमी तब्दील हुआ है
अब इंसानियत से बहुत दूर हुये लोग
तुम मिट्टी में रहकर कुछ कर न सके
कुछ कोयले में जीकर कोहिनूर हुए लोग
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यहाँ यूँही नहीं रहते उदास लोग
जी रहे ज़िन्दगी बे-लिबास लोग
बचपन दूध पिए जाम ज़वानी
बदल रहे हैं अपनी प्यास लोग
आदमी को आदमी से तोड़ने का
अब यहाँ करते हैं प्रयास लोग
दौलत,मतलब,मज़हब के खातिर
इंसानियत से हुए बदहवास लोग
हम तो जी गए गैरों की बदौलत
बर्बादी का सबब थे खास लोग
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लगे रहे साहिल पे शामियाने कई
समुन्दर में छिपे थे ख़ज़ाने कई
हुनर को यहाँ मौका नहीं मिलता
और करते हैं बुज़दिल बहाने कई
सियासत शायद ये भूल गयी है
मिटे हैं इस वतन पर दीवाने कई
तब कहीं जाकर एक मुकाम पाया
इस ज़िन्दगी ने बदले ठिकाने कई
मेरे शहर में जबसे आये हो तुम
बर्बाद हो गये हैं मयखाने कई
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मुफाईलुन *4
मुहब्बत का कोई पहलू अगर दुश्वार हो जाए
ज़मानेभर कि खुशियों का चलन इंकार हो जाए
समन्दर से सभी अपने तअल्लुक ठीक रखते हैं
कि कैसे भी मिरी कश्ती यहाँ उस पार हो जाए
ये दुनियां रोक न पाए मिलाता है ख़ुदा उनको
अगर दिल को मुहब्बत की तलब इकबार हो जाए
न मरते लोग लाचारी में दर्द न मुफ़लिसी देती
कभी सच में ग़रीबों की अगर सरकार हो जाए
वो आँखें फिर कभी ज़न्नत कि क्या करें बेख़बर
जिसे तेरा ख्यालों में महज़ दीदार हो जाए
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जातिधर्म की इस दादागिरी में लोग
दंगे करेंगे इक्कीसवीं सदी में लोग
हक़ मज़लूमों का छीनने वालों सुनों
फिर तलवार उठाएंगे बेबसी में लोग
जो आज गली मुहल्ले में कर रहे
कल सियासत करेंगे घर ही में लोग
मुल्क में फिर विदेशी राज करेंगे
अगर लड़ते रहे आपस ही में लोग
अभी तो सहारा अंधेरों का लेते हैं
कल नंगा नाच करेंगे रौशनी में लोग
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झुक नहीं सकता किसी की दरवारी में
सर भले ही कट जाए मेरा ख़ुद्दारी में
हालत देखके किसी की औकात न माप
शहर जल सकता है एक चिंगारी में
हँसते हैं बेबसी में कभी रो भी लेते हैं
ज़िन्दगी जी रहे हैं लोग लाचारी में
सांस्क्रति समारोह अब होने लगा रंगारंग
कलायें मिट गयीं रफ़्ता-रफ़्ता अदाकारी में
मेहनत और ईमान का ख्याल रख बेख़बर
कमाई हराम की चली न जाए बीमारी में
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मंसूब रहो न यूँ इकाई,दहाई में
सब डूबना है ख़ुदा की ख़ुदाई में
जो बेचैन रख्खे ऐसी दौलत छोड़ो
सकून है ईमान की कमाई में
महफ़िलों में मिले बस चन्द खुशियाँ
सादगी एक ज़िन्दगी है तन्हाई में
गड्डा खोद रहे दूसरों के लिए जो
देखना वही गिरेंगे किसी खाई में
माना मर्ज़ में आराम मिलता है
पर ज़हर होता है हर दवाई में
तुम जहाँ को मिलाने चले बेख़बर
जब झगड़ा हो रहा भाई-भाई में
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बनावटी आदाब सजाता है
नये नये अंदाज़ दिखाता है
वफ़ा नहीं होती अब लोगों में
किसे वफ़ा की बात सुनाता है
हवा महज़ किरदार निभाती है
वही जलाये ,दीप बुझाता है
हुनर दिया पंछी को उड़ने का
अगर शिकारी तीर चलाता है
बना दिया गूंगा सच्चाई को
यहाँ सियासत झूठ चलाता है
ये भी रब की एक इबादत है
जो भी यहाँ मेहनत से कमाता है
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यहाँ लाज़मी है ख़ता होना
कठिन हो गया है ख़ुदा होना
सदा पाक़ रखना जिगर अपना
कभी तुम नहीं बेवफ़ा होना
अगर वक़्त की बेबसी न हो तो
यहाँ कौन चाहे जुदा होना
हुनर कम सही इस सफ़र में पर
ज़रूरी है अब हौसला होना
तअल्लुक सदा ठीक रखता है
ज़रा दरमियाँ फ़ासला होना
तुम्हारे लवों पर तो आसान है
किसी भी ज़हर का दवा होना ,
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बिन देखे हैसियत एहतिराम करना
सदा बड़े बुजुर्गों को सलाम करना
पा ही लेगा मंज़िल हुनर तुम्हारा
इबादत वक़्त की सुबह-शाम करना
माँ-बाप,मुल्क को तुम पर गर्व हो
पढ़-लिखकर कुछ ऐसा काम करना
कड़ी कम क़ीमत पर वो बिक गये
जो चाहते थे सस्ते हर दाम करना
बेख़बर भटकते हुए ये उम्र है गुज़री
अब दिल चाहता है आराम करना
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फ़ाइलुन फ़ऊलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
इक सहज़ हक़ीक़त का ख़वाब होना
लाज़िमी है आँखों का ख़राब होना
सामना मुसीबत का करे न कोई
चाहतें तो सब हैं कामयाब होना
सामने किसी दिन आयगी हक़ीक़त
झूठ को पढ़ेगा बे-नक़ाब होना
सब यहाँ करिश्मा हीतो है ख़ुदा का
बादलों के भीतर आग-आब होना
इक दफ़ा तुम्हारे गर लवों को छू लें
फिर यहाँ ज़हर चाहे शराब होना
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सरकारें छिछलीं बारिशें करती रहीं चट्टानों में
कभी आयी न हरियाली मज़दूर किसानों में
लोग ख़ुश हैं मेरे परदेश से,सिर्फ माँ के सिवा
ये ग़रीबी हमें ले आयी शहर के कारखानों में
कि एक मुसलमान दोस्त की मुरादें पूरी हो
इस हिन्दू नें कुछ रोज़े रख्खे थे रमजानों में
ये दौलत के पीछे दौड़ती मशीन बन गया है
या ख़ुदा फिर इन्सानियत भर दे इन्सानों में
शहर में तब कहीं अपना एक घर बना पाया
तमाम उम्र गुज़ारी है किराये के मकानों में।
[25)
ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
बहर= फ़ायलातुन ×3
बन गया मतलब सलीक़ा ज़िन्दगी का
अब नहीं कोई भरोषा आदमी का
दोस्तों का ढंग रखना आजमाये
अब बदल जो गया तरीका दुश्मनी का
रात भर छाये रहे घनघोर बादल
फिर बना जुगनूं मसीहा चाँदनी का
क्यों बना डाले ये मज़हब आदमी ने
एक ही अल्लाह जब है हर किसी का
जिस जगह लिख्खा तुम्हारा नाम बेख़बर
मोड़ कर रख्खा वो पन्ना डायरी का,
[26)
ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
बहर= मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन
कभी आना कभी जाना ख़यालों से
परेशां है ज़हन इन मस्त चालों से
ख़ुदा देता किसी को मखमली बिस्तर
यहाँ जाड़ा गुज़र जाये दुशालों से
सियासत ,मज़हबी होने लगी जबसे
समाचार भर जाता है बवालों से
महज़ पलभर अँधेरा दूर होगा कुछ
न दिल होता कभी रौशन मशालों से
किसी की तीरगी में ज़िन्दगी गुजरे
कोई घर भर दिया रब नें उजालों से।
27
इस दरिया को कुरेद ज़रा
पत्थर पानी में फ़ेक ज़रा
रच हुनर की बदौलत कुछ
कुछ लिख्खा हुआ मेट ज़रा
बुराई बाहर मत देखा कर
अपने अन्दर भी देख ज़रा
शहर वालों,कि कैसे उगता है
आकर देखो हमारे खेत ज़रा
ज़ियादा नया नया मत जोड़
बिखरा हुआ भी समेट ज़रा
28
इश्क़ ज़र्द बनता गया
अश्क शेर लिखता गया
याद तुम यूँ आते रहे
दर्द और बढ़ता गया
आइना रहा आइना
रंग रूप चढ़ता गया
ताल मेल था ज़ीस्त का
वक़्त साथ चलता गया
ज़िन्दगी ग़ज़ल बन गयी
बे-जुबां भी पढ़ता गया
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[7:13 PM, 6/14/2019] वैभव बेख़बर: वैभव बेख़बर
इस दिल में जबसे मुहब्बतों के कुछ पल आये
हल तमाम मसलों के ख़ुद ब खुद निकल आये,
जाकर कोई बता दे इन इतराती हुई मझधारों को
कि कल मेरे सफ़ीने रुख सैलाबों का बदल आये,
जाने किस ज़ानिब ये कदम चलते रहे उम्रभर
सफ़र तो सफ़र, मंज़िलों से आगे निकल आये,
30
और लोगों ने अपने हाँथों में पत्थर उठा लिए
कई मुदतों के बाद तो इस शज़र पर फ़ल आये,
ज़ुल्म की हदें पार कर रहा है ये ज़माना बेख़बर
हो सकता है अब ज़मीं की तहों में हलचल आये,
31
वैभव बेख़बर
[7:13 PM, 6/14/2019] वैभव बेख़बर: वैभव बेख़बर
चाहे किसी बे-वफ़ा से दुबारा करो
मगर वक़्त को इश्क़ में गुज़ारा करो,
बहा बहा कर अपने आंसुओं को
इस समन्दर को और मत खारा करो,
अब हुनर को टकराने दो मझधारों से
इन फ़रेबी कश्तियों से किनारा करो,
प्रेम की भाषा समझता नहीं हर कोई
यहाँ बहरों को ज़ोर से पुकारा करो,
बुरे न नज़र आने लगें अच्छे मन्ज़र
सूरतें ज़्यादा गौर से मत निहारा करो,
पा न लो जब तक अपनी मन्ज़िल
बेख़बर तब तक कोशिशें दुबारा करों,
[7:16 PM, 6/14/2019] वैभव बेख़बर:
32 ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
ऐसे मोड़ पे ये दिल उछाल आये
कि रह रह के उसका ख्याल आये
अब मझधारें उन्हीं को डुबोने लगीं
नेकियाँ ,दरिया में जो डाल आये
जब इश्क़ था, तुम ख़ुदा थे हमारे
अब वो ख़्वाहिश भी निकाल आये
किया उरूज़ का कारोबार इसलिए
सब मेरे हिस्से में ही ज़वाल आये
भष्टाचार एक व्यवस्था बन गयी
दफ्तरों में जबसे ये दलाल आये
लुटे भी तो एक तालाब के किनारे
जबकि समुन्दर कई खंगाल आये।
[7:17 PM, 6/14/2019] वैभव बेख़बर:
33
वैभव बेख़बर
एक से दो, फिर दो से चार होना
हुनर को आता है खनकदार होना
होतीं हैं तमाम कश्तियाँ ज़िन्दगी में
बड़ा मुश्किल होता है पतवार होना
सबसे घिनौना पाप है ,इस धरा पर
मानव का मानवता से ग़द्दार होना
इस मतलबी मन की मैली दुनियाँ में
काम आसां नहीं है ईमानदार होना
लड़कियां कोक में ही मरतीं रहेंगीं
अगर बन्द न हुआ बलत्कार होना
दुनियां की तबाही का कारण बनेगा
जातिवाद-मज़हब की दीवार होना
झूठ जबसे छपने लगा है बेख़बर
हर कागज़ नहीं चाहे अख़बार होना।
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[5:17 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर: वैभव बेख़बर
तमाम ज़हमत पहले उठाई उसने
नज़र तब कहीं जाकर मिलाई उसने
शहर के दिवाने फ़िर परेशान हुए
ये अब किस तरह ली अँगड़ाई उसने
तमाम तकलीफें उठाई जिनके लिए
ग़मों से करा दी आशनाई उसने
मिरी बात रख ली,फिरसे बात बनाकर
पता था क़सम झूठी है खाई उसने
मुहब्बत में जिसकी हम हुए हैं बंज़र
किसी और से उल्फ़त निभाई उसने।
[5:17 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
35
वैभव बेख़बर
9455062093
मासूम कैद में हैं बहुत लाचार लोग
जबसे न्यायाधीश हुए गुनहगार लोग
अब कब्ज़ा अमानत पर दबंगों का है
कचहरी दौड़ भाग रहे हक़दार लोग
कुछ ख़ुद को मालिक समझ बैठे हैं
जबकि सब हैं यहां किरायेदार लोग
अब भी हुनरवाले राहों में भटक रहे
और बुलन्दियां पा गए चाटुकार लोग
ये ज़माना है मतलबी फ़ितरतों का
मुश्किल से मिलते हैं खुद्दार लोग
जाति धर्म की बात करते हैं बेख़बर
अब सियासत करने लगे बेकार लोग।
[5:17 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
36
वैभव बेख़बर
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
कोई ख़्वाब सजाकर देखो
आगे पांव बढ़ाकर देखो
जाना है उस पार अगर तो
अब बीच भँवर आकर देखो
दर्द-ए-पीठ सही हो जाये
सर का बोझ बढ़ाकर देखो
मोम पे रौब जमाते हैं सब
पत्थर को पिघलाकर देखो
सच की जीत सदा होनी है
झूठों से टकराकर देखो
इश्क़ तुम्हारा सच्चा बेख़बर
जिस्मों जान लुटाकर देखो।
[5:18 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
37
वैभव बेख़बर
ख़्वाब कोई सजाकर देखो
पांव अब तो बढ़ाकर देखो
शायद कमर सही हो जाये
बोझ सर का बढ़ाकर देखो
हार या जीत हो एक दफ़ा
दांव पर दिल लगाकर देखो
इश्क़ सच्चा तुम्हारा है तो
नफ़रतों को झुकाकर देखो
पार तुमको अगर जाना है
नाव कोई चलाकर देखो
जीस्त आदर्श बन जायेगी
मुल्क़ पर जां लुटाकर देखो,
जीस्त=ज़िन्दगी
[5:18 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
38 वैभव बेख़बर
9455062093
दोनों तरफ़ से शऊर-ए-अदब नहीं होता
तो यहां ज़मीं नहीं होती ये नभ नहीं होता
तमाम डिग्रियां हासिल कर ये मालूम हुआ
धरा पे मां से बड़ा कोई मक़तब नहीं होता
रंक और राजा के मन्ज़र बदल सकता है
यहां ये वक़्त किसी का साहब नहीं होता
पीर,तकदीर,हुनर तमाम संघर्ष होगा पीछे
बेवज़ह अकारण कोई गज़ब नहीं होता
जिससे मन्दिर जाते हैं लोग मस्ज़िद भी
उन रास्तों का कोई मज़हब नहीं होता
उसका हुआ करता था जिसका कोई नहीं
इस दौर में तो गरीबों का रब नहीं होता
…
[5:18 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
39
वैभव बेख़बर
महलों में तो चकाचौंध है चाँदनी नहीं
और यहां गरीबों के घर में रौशनी नहीं,
झूठ वालों के आजकल खर्चे हैं इतने
ईमानदारों की जितनी आमदनी नहीं
प्यास के काबिल नहीं दो बूँद भी पर
समन्दर को पानी की कोई कमी नहीं
कोई आवाज़ नहीं ज़ुल्म के ख़िलाफ़
शायद इस मुल्क़ में कोई आदमी नहीं
मुफ़लिसी दर-बदर भटकती ही रही
मग़र बात किसी दर पर बनी नहीं
हक़ नहीं जैसे हवाओं पे किसी का
वैसे ही चीज़ अपनी कोई अपनी नहीं।
[5:19 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
40
वैभव बेख़बर
रह गया दिल सूखा जंगल होकर
तुम तो बरसे भी न बादल होकर
उस दिल की तुमने तड़प न जानी
जिसने चाहा तुमको पागल होकर
यहां अब पीर पराई कोई न समझें
ज़ख्म महसूस करो घायल होकर
सरस्वती शायद इसीलिए ग़ुम हुईं
तुम ना-पाक़ रहे गंगा जल होकर
कुछ अधूरापन भी जरूरी है बेख़बर
आदमी टूट जाता है मुकम्मल होकर।
[5:19 PM, 6/24/2019] वैभव बेख़बर:
41 वैभव बेख़बर
जलती आग बुझाता जा
दिल का राज बता ता जा
चलना काम हवा का है
तू भी दीप जलाता जा
मिल जायेगी मन्ज़िल ख़ुद
पथ पर पांव बढ़ाता जा
कल की छोड़ फ़िक्र करना
अपना आज बनाता जा
धन तो बैर करा देगा
दिल में प्यार कमाता जा,
42
क़दम लड़खड़ा रहे हैं प्यास में
ज़रा शराब ही भर दे गिलास में
बदलते वक़्त को मालूम नहीं
सुन्दरता अच्छी लगे लिबास में
लाचार लोग अंधेरों में तड़प रहे
ज़श्न रोज हो मत्री निवास में
मुश्किल है भरत जैसा भाई होना
राम राजा बने रहे बनवास में
करीब होकर वो अनजान रहे
और हम भटकते रहे तलाश में
४३
वैभव बेख़बर
वज़्न=1222 122 122 12
अँधेरों की निगाहों में ताला रहे
जलो ऐसे कि शब भर उजाला रहे
शब=रात
कठिन लगता नहीं फिर कोई सा सफ़र
इरादों का जहां बोल-बाला रहे
ज़रूरी है सभी मज़हबों के लिए
गरीबों के लिए पाठ शाला रहे
दवा की अहमियत भूल जाएं न हम
दुआ तुम भी करो ,दर्द वाला रहे
सदा पाक रखना तुम ज़मीर अपना
बदन चाहें उमर भर, ये काला रहे।
44
वैभव बेख़बर
वज़्न= 122 122 121 212
हुआ है ज़माना, ख़राब इस क़दर
रहा मत करो, बे-नक़ाब इस कदर
सदा इस शहर में ,जो महकता रहे
कोई खिल,सका ना,गुलाब इस कदर
रहेगी ख़ुमारी , हमें ,ये ता-उमर
पिलायी है उसने ,शराब इस कदर
सदा साथ सच के ,चले ,गिरे ,उठे
कहाँ हम हुए, क़ामयाब इस कदर
सजाये नहीं ,फिर क़भी निग़ाहों ने
गया तोड़ करके,वो ख़वाब इस कदर
45
वैभव बेख़बर
वज़्न= 22 22 22 22 22 2
हाँ दिल की बातें कहने से डरता हूँ
मैं भी उनसे प्यार बहुत अब करता हूँ
जानें क्यों उल्टा उल्टा लगता सबको
जबसे सीधी सीधी बातें करता हूँ
यादों की अलमारी में कुछ रक्खें हैं
खत उनके तन्हाई में अब पढ़ता हूँ
दूर नहीं अब मन्ज़िल ऐसा लगता है
रोज़ नयी तकलीफों से मैं लड़ता हूँ
दिल को खाली खाली सा जब लगता है
लफ़्ज़ों में ज़ज्बात सुहाने भरता हूँ।
वैभव बेख़बर
46
वैभव बेख़बर
पढ़ा लिखा है इतना काम तो कर
बुजुर्गों के पैर न छू,सलाम तो कर
सिर्फ तुम्हारे बुलाने पे, मैं आया हूँ
कुछ ठंडा-गरम का निज़ाम तो कर
अह क़ब्र बनाने वाले, सुन पहले
मेरी मौत का इन्तज़ाम तो कर
इससे पहले कि मैं पागल हो जाऊं
अह इश्क़ हमें बदनाम तो कर
अगर उनका प्यार पाना चाहता है
जिस्मों-जाँ अपना नीलाम तो कर
तुम ग़ालिब बनने चले हो बेख़बर
पहले मीर के जैसा कलाम तो कर।
वैभव बेख़बर
47
लोग उजड़ रहे ,बेबसी में लाचारी में
सरकारें मस्त हैं अपनी अदाकारी में
सबकी छतों पर आकर बैठा है झूठ
अब यहां सच तो कैद है चार-दिवारी में
मन्ज़िल के मुसाफ़िर तो सफ़र में हैं
निठल्ले ही पड़े हैं इस दुनियादारी में
टेलिविजन पर नज़र आते आजकल
ज़ाहिल मज़हबों की अलम्बरदारी में
अक्सर रईशों को दौलत बचा लेती है
सदा ग़रीब ही मरता है महामारी में
कोई पैग़म्बर मुहब्बतों का ढूंढ लाओ
नफ़रत फिर है तवाही की तैयारी में
कुछ पेट का इन्तज़ाम भी कर बेख़बर
क़लम कब तक चलाएगा दुश्व़ारी में।
48
वैभव बेख़बर
वज़्न=1212 22 22 1 22 12
मुख़ालिफत करने सारा जहां आ गया
ये इश्क़ लेकर हमको तूं कहाँ आ गया
कि बे-वफाओं पर लुटने को तैयार है
यकीं नहीं होता मसला यहां आ गया
थ इन्तज़ार अभी तक रौशनी का मगर
चिराग़ जल ही ना पाये धुँआ आ गया
करीबियों में दिल,खोया रहा इस कदर
के फ़ासला जाने कब,दरमियाँ आ गया
बुरी सियासत के रहमों करम का क़हर
फ़साद में चमन हिन्दोस्ताँ आ गय
49
वैभव बेख़बर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
सही चार दिन ही ,हया काम आई
हसीनों को हुश़्ने, अदा काम आई
न कोई तुम्हारी दवा काम आई
दिले-ज़ख्म को फिर हवा काम आई
यहीं सूद ब्याज़ सब ,देना पड़ेगा
बेईमान को कब नफ़ा काम आई
सुना है तुम्हें इश्क़ ,हमसे हुआ है
येकिस ज़ुर्म की अब सज़ा काम आई
सताया भी होगा,रुलाया भी होगा
वफ़ा आपके और क्या काम आई।
50
वैभव बेख़बर
9455062093
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
लड़ रहे हैं सभी ज़िन्दगी के लिए
क्या बचा अब यहां आदमी के लिए
मतलबी दौर के मतलबी लोग हैं
कोइ होता नहीं अब किसी के लिए
हाँ में हाँ हम अगर जो मिलाते नहीं
दोस्त तैयार थे दुश्मनी के लिए
इक हसीं चाँद मुझको सताता रहा
ता उम्र हम फिरे रौशनी के लिए
ज़ख्म दिल के अभी सुर्ख़ हैं बेख़बर
लफ़्ज़ कुछ भेज दो शायरी के लिए।
51
वैभव बेख़बर
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
उधर जाना जरूरी है बहुत, इक बार ले आओ
ये कश्ती डूब ना जाये कोई पतवार ले आओ
सताते हो, रुलाते हो, बहुत तुम दर्द देते हो
के जिससे जां चली जाए वही तलवार ले आओ
न खाली वार जाता हो,ज़रा लहज़ा भी तगड़ा हो
कोई दुश्मन मिरे यारा यहां दिलदार ले आओ
छला है इस नकाबी दौर नें हमको यहां अक्सर
हो तन मन एक जैसा तुम वही किरदार ले आओ
बहुत ,मज़बूर बेबस लोग हैं दौलत की बस्ती में
गरीबों की सुने आवाज, वह सरकार ले आओ।
वैभव बेख़बर
52
वैभव बेख़बर
एक दिन सजेगा मेरा घर भी
ये हुनर बदल देगा मुक़द्दर भी
ये आसुओं की तरह खारा है
इश्क़ में रोया होगा समंदर भी
कभी दिल में बसाया करते थे
अब मिलाते नहीं है नज़र भी
सेज फूलों की नहीं है बेवजह
मैंने देखा काँटो का बिस्तर भी
चाँद से कहो ये दूरी ठीक नहीं
कभी आसमां सेआओ उतर भी
नशीला इश्क़ से ज़्यादा नहीं था
जाम क्या,मैंने पिया है ज़हर भी
जिससे तुमको इतनी मुहब्बत है
उड़जाएगा एकदिन ये कबूतर भी
वैभव बेख़बर
53
हसीन पिंज़रों में हो रहे वीरान लोग
चार दीवारी को समझते हैं मकान लोग
पक्के घरों में बारिश का मज़ा ढूंढते हैं
कच्चीमिट्टी की ख़ुशबू से अन्ज़ान लोग
प्यार ,वफ़ा,शऊर ,सलीक़े की बात करें
भूल जाते हैं हक़ीक़त के दरम्यान लोग
गिरते जा रहे हैं ,दिन-ब-दिन ज़मीर से
और ये छूना चाहतें हैं आसमान लोग
शरीयत तो कुछ मनुस्मृति लाना चाहें
मज़हबी मिटाना चाहतें संविधान लोग
याद करते होंगे गंगा जमुना तहज़ीब को
जो कभी चले गए थे पाकिस्तान लोग।
वैभव बेख़बर
54
ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
122 122 122
गए भूल मेरा पता क्या
कोई मिल गया दूसरा क्या
अँधेरे सफेद हो रहे हैं
जलेगा यहां अब दिया क्या
बहुत ही क़रीब आ रहे हो
हो जाओगे तुमभी ज़ुदा क्या
न जाने ये बोतल शराबी
मुहब्बत में होता नशा क्या
दुआ काम आयी न उसकी
असर अब करेगी दवा क्या
ज़ुलम दिन-ब-दिन बढ़ रहा है
कहीं हो गया ग़ुम ख़ुदा क्या। वैभव बेख़बर
55
[4:25 PM, 7/8/2019] वैभव बेख़बर: ग़ज़ल
( 07/07/19 ) वैभव बेख़बर
फूल हो या खार इश्क़ का है
हर दिल गुनहगार इश्क़ का है
ग़म, बे-करारी, ये दर्द , आंसू
है जो भी सिंगार इश्क़ का है
रक्खा हमें बे-क़रार बहुत पर
थोड़ा है जो क़रार इश्क़ का है
नफ़रत मिटा दे, नहीं हो सकता
जीवन ये आधार इश्क़ का है
ख़ामोश रहकर पढ़ा करो तुम
बेख़बर ये अख़बार इश्क़ का है।
56
[4:25 PM, 7/8/2019] वैभव बेख़बर: लोग उजड़ रहे ,बेबसी में लाचारी में
सरकारें मस्त हैं अपनी अदाकारी में
सबकी छतों पर आकर बैठा है झूठ
अब यहां सच कैद है चार-दिवारी में
मन्ज़िल के मुसाफ़िर तो सफ़र में हैं
निठल्ले ही पड़े हैं इस दुनियादारी में
टेलिविजन पर नज़र आते आजकल
ज़ाहिल मज़हबों की अलम्बरदारी में
अक्सर रईशों को दौलत बचा लेती है
सदा ग़रीब ही मरता है महामारी में
कोई पैग़म्बर मुहब्बतों का ढूंढ लाओ
नफ़रत फिर है तवाही की तैयारी में
कुछ पेट का इन्तज़ाम भी कर बेख़बर
क़लम कब तक चलाएगा दुश्व़ारी में।
57
वैभव बेख़बर
[4:26 PM, 7/8/2019] वैभव बेख़बर: ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
122 122 122 12
हक़ीक़त को अक़्सर छिपाना पड़ा
कभी था नही जो दिखाना पड़ा
तन्हाई में जिसने रुलाया बहुत
हुआ सामना मुस्कराना पड़ा
वज़ह बे-वज़ह याद आते रहे
सितम इश्क़ में यह उठाना पड़ा
हुनर क़ैद में कब रहा है भला
परिन्दों को पिन्ज्रा उड़ाना पड़ा
शहर में लगी आग यूँ ही नहीं
घरौंदा हमें भी जलाना पड़ा।
58
[4:27 PM, 7/8/2019] वैभव बेख़बर: ग़ज़ल
वैभव बेख़बर
फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊ
कहाँ गुम हुये दिन सुहाने गये
अदब के हसीं वो ज़माने गये
बुज़ुर्गों से लेते नहीं मशवरा
ये लड़के ज़रा क्या कमाने गये
बदन धूप में जल गया काम कर
तभी पेट में चार दाने गये
पढ़ाई मिरी हो सके इस लिए
पिता जी शहर में कमाने गये
सदा अहतिराम क9ना बेख़बर
जो जां शरहदों पर लुटाने गये
59
[11:37 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर: 122 122 122 122
वैभव बेख़बर
ज़मीं से, गगन तक, है होना ,उसी का
है जो भी, यहाँ कोना-कोना उसी का
खिलाड़ी , भी है, हर खिलौना उसी का
ये हीरे, ये मोती, ये सोना उसी का
हँसी,चार दिन की, ख़ुशी चार दिन की
नयन रो रहे बस , है रोना उसी का
चले जायगें, वक़्त अपना, बिताकर
ये बिस्तर, ये चादर, बिछौना उसी का
अमीरी , ग़रीबी, यहां हर तमाशा
नज़र देखतीं, सब दिखौना उसी का।
वैभव बेख़बर
[11:37 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर:
60
15/07/2019 वैभव बेख़बर
कब कैसे फ़सायें हमें उलझनों में
ये बात चलती रहती है दुश्मनों में
ग़ुरूर करने वाले टूट जाते हैं यहां
शज़र जो झुकते नहीं आंधियों में
बाज़ार में सिक्का, बोले उसी का
पास हुनर है जिसके बाज़ुओं में
धुँधलायीं आंखे,चेहरा झुलस गया
जाने कितनी आग थी आसुओं में
पगलाये रहते हैं कुछ हम लोग ही
कुछ खास नहीं होता लड़कियों में।
[11:37 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर:
61
वैभव बेख़बर
आये जबसे नफ़रतों के बाज़ार वाले
चले गए दिन प्यार की बहार वाले
सदा सत्ता का ही गुणगान करते हैं
लगता सब बिक गए समाचार वाले
सरकारी दल्लों ने,रिश्व़त के नाम पे
यहां जाने कितने गरीब मार डाले
जाति-धर्म की गन्दी,ऊंच नीच यहां
जल्दही लायेगी दिन नरसंहार वाले
बेख़बर तुम भी बेचते ज़मीर अपना
हो गए होते, गाड़ी,बंगला कार वाले
[11:37 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर:
62
122 122 122 122
वैभव बेख़बर
बहुत दूर तक दिख रही है उदासी
ये दुनियां नज़र,आ रही है ख़ुदा सी
हमीं ने ख़बर दी ,उसे लूट की,पर
वही ले रहा है, हमारी तलाशी
हुनर खो गया दीद सीरत करे जो
ज़माना ये सारा हुआ है लिबासी
चले आइये, बारिशों की तरह अब
हवा में,जलन है ज़मीं है ये प्यासी
खफ़ा हो गए,क्यों ज़ुदा हो गए तुम
हमें ज़िन्दगी, अब लगे,बे-वफ़ा सी।
[11:38 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर:
63
वैभव बेख़बर
फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन
212 212 212 212
दिल लगाकर चले ,सर उठाकर चले
हर नज़र से नज़र हम मिलाकर चले
देख तो लीजिये हसरतों का सफ़र
आग दिल में कहां तुम लगाकर चले
रातभर जागते याद कर हम जिन्हें
ख़्वाब भी वो हमारे चुकाकर चले
रोक भी ना सके, हम उन्हें चाहकर
हाँथ से हाँथ जब वो छुड़ाकर चले
पूछ हमनें लिया, हाल जब वो मिले
शायरी ही हमारी सुनाकर चले।
[11:38 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर: ,
64
वैभव बेख़बर
सफ़र में सितम बहुत उठाना पड़ेगा
मन्ज़िल दूर सही ,मगर जाना पड़ेगा
उदास होने के मौसम तो आते रहेंगे
माहौल मुस्कराहट का बनाना पड़ेगा
यहां सौदागर किसी के घर नहीं जाते
हुनर को बाज़ार तक ले जाना पड़ेगा
सच की गवाही ,एक दिन वक़्त देगा
फिर झूठ को तो सामने आना पड़ेगा
गर आदमी समझने लगा आदमियत
मज़हबी दीवारों को गिराना पड़ेगा
वहीं किसी से मेरा पता पूछ लेना
इसी रास्ते में आगे मैखाना पड़ेगा
[11:38 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर:
65
वैभव बेख़बर
तीरंदाज़ी तेरी कमाल है मगर याद रखना
ये परिन्दें भी रखते हैं हुनर याद रखना
ज़ुल्म सहकर जी गए,फ़क़ीर थे हम लोग
आना वाला है आपका नम्बर याद रखना
ग़ुरूर ,दीमक है,ये वज़ूद ही खा जायेगा
यकीं न हो तो,रावण का घर याद रखना
तेरी कश्तियों के हुनर पे,कोई शक नहीं
मगर कहाँ है समन्दर में,भँवर याद रखना
कोई मुक़ाम हसीन सा पाकर भी बेख़बर
गर्दिश में जो गुज़रा, सफ़र याद रखना।
[11:38 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर: ,
66
वज़्न= 122 122 1222 2212
वैभव बेख़बर
मुहब्बत में हद से गुज़र जाना अच्छा नहीं
ख़मोश रहकर भी, बिखर जाना अच्छा नहीं
कहीं अहमियत खो न जाये इस किरदार की
ज़ियादा अदाओं के घर जाना अच्छा नहीं
ज़रूरी है कुछ दाग़ दामन पर आएं नज़र
जहां की नज़र में सँवर जाना अच्छा नहीं
ये मुमकिन हो सकता कोई तूफ़ां आये यहां
अचानक हवा का ठहर जाना अच्छा नहीं
कभी सामने जाकर किया कर टकरार भी
मुसीबत को देख कर डर जाना अच्छा नहीं
[11:39 AM, 7/18/2019] वैभव बेख़बर: ,
67
वैभव बेख़बर
वज़्न= 212 22 12 212 22 12
भूख, महँगाई , ग़रीबी कहाँ मुद्दा हुआ
मज़हबी मसलों में है आदमी उलझा हुआ
नेकियों की राह पर आदमी चलता नहीं
मतलबी ख्यालों में हर शख़्स है बहका हुआ
देखता हूँ मैं यहाँ,आएदिन दिन अख़बार में
राम औ अल्लाह के नाम पर दंगा हुआ
लोग अब करने लगे हैं ,सियासत भूख पर
दौर है बदला हुआ, वक़्त है बदला हुआ
खोलता था, जो पुलिन्दा, सियासी ज़ुल्म का
बेख़बर मालुम करो, आदमी का क्या हुआ।
Written by वैभव बेख़बर
68
वैभव बेख़बर
नज़र आये तब ढलान की तरह
खुदे हम अक्सर खदान की तरह
बहुत आये लोग फिर चले गए
खड़े हैं हम, इक मकान की तरह
अगर वो आते मिरे लबों तलक
महकते ऊर्दू ज़बान की तरह
चले होते साथ साथ तुम अगर
न फ़िरते हम ,बद-गुमान की तरह
ये रफ़्ता रफ़्ता गुज़र गयी उमर
मुहब्बत की दास्तान की तरह।
69
वैभव बेख़बर
कहाँ , कैसी , डगर है , खुदा जाने
मुझे जाना किधर है, खुदा जाने
मैं अपने, काम से ,काम रखता हूँ
नज़र किसकी,किधर है खुदा जाने
वही अक्सर, बनाता , मिटाता है
सलामत,कौन घर है, खुदा जाने
लहर लायी, मुझे तो,किनारों तक
समन्दर में, भँवर है, खुदा जाने
बहुत पीछे, गयी छूट ,मन्ज़िल तो
मिरा कैसा ,सफ़र है, खुदा जाने
ज़माने का, ज़ुलम सब,गरीबों पर
कैसे होती, बसर है, खुदा जाने
मुसलसल,आदमी,हो रहा,क़ातिल
क़यामत का,असर है खुदा जाने
70
बिक गया है प्रशासन इस लोकतंत्र में
खूब हो रहा है शोषन इस लोकतंत्र में
काबिल था जब सरकारी नौकरी मिली
किये जाहिलों से लक्षन इस लोकतंत्र में
कानून का,अब तन्ख्वाह से गुज़ारा नहीं
इंसाफ़ चलरहा रिश्व़तन इस लोकतंत्र में
सड़क का बज़ट शायद जहाज को गया
फसा हादसों में जीवन इस लोकतंत्र में
बेख़बर,ये इंसान को इंसान,समझते नहीं
ख़तरा बना,मज़हबी पन इस लोकतंत्र में।
वैभव बेख़बर
71
बेख़बर
मरज़ बढ़ रहा है दिखाई तो दे
दुआ ना सही पर दवाई तो दे
ख़मोशी क कबतक मैं पीछा करुं
कहीं से मगर अब सुनाई तो दे
परेशां बहुत हैं निगाहें मिरीं
छुपा है कहाँ तू दिखाई तो दे
तुझे तो,पता है, मैं कातिल नहीं
मिरे हक़ में अपनी गवाही तो दे
दिए हैं किसी को महल ताज से
गरीबों , को मौला चटाई तो दे
गए सू ख सारे नगर के कुएं
गिरूं मैं कहाँ एक खाई तो दे।
[12:49 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
72
23/07/2019 वैभव बेख़बर
जो गुज़र गया उसपर पछताना नहीं
लौटकर आएगा गुज़रा ज़माना नहीं
कि हक़ीक़त का, अंदेशा ही ना रहे
ख़्वाब,आँखों मे इतने सजाना नहीं
कोई काटे न काटे, टूट जाएगी खुद
तुम कच्चे धागों से,पतंगे उड़ाना नहीं
अगर कोई ज़रूरत हो तो मांग लेना
कभी मेहनत किसी की चुराना नहीं
फ़िज़ाओं में निकलकर आ बेख़बर
पिंज़रों में आता,मौसम सुहाना नहीं।
[12:49 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
73
वैभव बेख़बर
क्यों आख़िरी वक़्त दिल, बीमार करके
तुम जा रहे इश्क़ का इज़हार करके
साहिल जिसे रास ,अब आने लगा है
करना उसे क्या, समन्दर पार करके
कहते यहां हम ,सिकन्दर अब उसी को
जो दुश्मनों से ,लड़े ललकार करके
कोई शहनशाह है ख्वाबों में उसके
देखो किसी और से तुम प्यार करके
हमनें बहुत जंग जीतीं ,पर यहां कल
दिल जीत उसने लिया,सब हार करके।
[12:49 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
74
वैभब बेख़बर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ
122 122 122 12
नदी की तरह कुछ रवानी में हैं
मगर दर्द , पानी के पानी में हैं
बहुत कुछ हुआ,पर हुआ कुछ नहीं
हक़ीकत में थे, अब कहानी में हैं
तभी बढ़ रहा है असर झूठ का
कि सच्चे सभी बे- ज़ुबानी में हैं
यहां लड़ रहे लोग दैरो- हरम
सभी के ख़ुदा आसमानी में हैं
बहुत बढ़ रहा है अँधेरा मगर
ये सूरज नये बद- गुमानी में हैं।
[12:50 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
75
फ़ायलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन
2 1 2 12 2 122 2
Written by वैभव बेख़बर
इस डगर को आसां बनाता चल
रास्तों के पत्थर हटाता चल
ख़ुद-ब-ख़ुद महकने लगेगा घर
कुछ नये नये गुल ,खिलाता चल
मन्ज़िलें इसी राह पर होंगीं
तू क़दम मुसलसल बढ़ाता चल
यदि ग़ुरूर आने लगे खुद पर
आइना हुनर को दिखाता चल
आग जो , लगाने लगे बेख़बर
तू चिराग़ ऐसे , बुझाता चल।
[12:50 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
76
वैभव बेख़बर
इनआंखों में हंसी ,ख्वाब भी नहीं
किरदार में कोई, नकाब भी नहीं
होशो हवास खोए रहते हैं क्यों
जब कि पीता , मैं शराब भी नही
वो आंसुओं में ही डूब गया होगा
पास में नदी,कोई तालाब भी नहीं
कि इस जमीन से दुश्मनी कर लूँ
वो चाँद इतना लाज़बाब भी नहीं
इस रातरानी को जरूरत है मेरी
पसंद तो मुझको, गुलाब भी नहीं
लहरें ही चलाती हैं सफीना मेरा
टकराता तो हमसे,सैलाब भी नहीं
उन्हें कोई और अच्छा लगने लगे
बेख़बर इतना तो खराब भी नहीं।
[12:50 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
77
1222 1222 1222
वैभव बेख़बर
मिरे किरदार में बस इक ख़राबी है
ज़रा ख़ुद्दार हूँ, लहज़ा नबाबी है
केहै मुमकिन निगाहों में भरम होना
यहां अब आदमी होता नक़ाबी है
हुनर है तो, मुक़द्दर भी, बदलता है
मगर मेहनत,हि हर ताले कि चाभी है
हवा के संग , झूमें हम बहारों में
चले आओ ,अभी मौसम,शराबी है
अँधेरे फिर, उसे भटका, नहीं सकते
हुनर जिसका,यहां पर आफ़ताबी है।
[12:50 PM, 7/26/2019] वैभव बेख़बर:
78
जीतता तो नहीं पर मैं हार से बच जाता हूँ
उलझू फूलों में मगर,खार से बच जाता हूँ
जाने कौन यहां मेरे हक में लड़ा करता है
मैं सदा दुश्मन के, हर वार से बच जाता हूँ
ख़ामोश रहने में, बस फायदा ये हुआ हमें
अक़्सर लोगों की,टकरार से बच जाता हूं
कुछ लूटने वाले दरवाज़े तक आ जाते हैं
अगर लूटने से ,मैं बाज़ार से बच जाता हूं
दीवारों से टकराता रहा है ,ये बदन उम्रभर
सड़क पर ख़ुदा जाने,कार से बच जाता हूँ
इस दुनियां ने इतना सिखा दिया है बेख़बर
सब से नहीं मगर दो चार से बच जाता हूँ।
79
[3:05 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
22 22 22 2 121 2 2
ख़ार को,ख़ार,गुलाब को बस ग़ुलाब कह दो
दुनियां वालों, तुम मुझको ख़राब कह दो
लोग इशारे, आंखों के , नहीं समझते
मुँह से, तुम अपना, सीधा, ज़बाब कह दो
दीदार हमें, करना है, करीब आकर
वो ,रुख से , आज हटा लें, नक़ाब कह दो
बन जाये,और नशीला ,मिज़ाज़ उसका
गर आप किसी पानी को, शराब ,कह दो
शायद हिम्मत ,जाग उठे, बुझे हुए हैं
आप चिराग़ों को, बस आफ़ताब कह दो।
[3:05 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
22 22 22 22
80
वैभव बेख़बर
इस दरिया की प्यास बुझा दो
अपने दिल की , बात बता दो
टूट न , जाए रिश्ता कोई
इससे , पहले हाथ बढ़ा दो
इश्क़ गुनाह, किया है , दिल ने
इस मुज़रिम को,सख़्त सज़ा दो
तिमिर ,में शहर, डूब न , जाए
मेरे घर को , आग लगा दो
झूम रहा है, तन मन मेरा
यारों आज ,शराब पिला दो
ख़त ना ,रखना हरजाई के
आग लगाकर ,राख , उड़ा दो…
[3:06 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
81
बह्र=फालुन फालुन फालुन फालुन फालुन फ़ा
वैभव बेख़बर
एक मकान बनाने में ,वक़्त लगेगा
गारा-ईंट जुटाने में वक़्त लगेगा
दिल के मयख़ाने में, पहली बार गए
पीने और पिलाने में ,वक़्त लगेगा
याद उन्हें, करते ही,आ जाते आंसू
आँख में अश्क़,छुपाने में,वक़्त लगेगा
घाव बदन पर ,होता तो,भर भी जाता
दिल का ज़ख्म,सुखाने में,वक़्त लगेगा
मन्ज़िल और सफ़र में, दूरी कम होगी
तुम तक आने जाने में वक़्त लगेगा
थोड़ा और बड़ा होने दो, पेड़ अभी
फू…
82
[3:06 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
22 22 22 22 2 122
वैभव बेख़बर
हमने ख़ुद ही छोड़ा है अपना ठिकाना
फ़िर पास किसे रखना ,किससे दूर जाना,
दीवाना, दिलवर, यूँ हीं ,मिलता नहीं है
पागल, ख़ुद को ,इश्क़ में, पड़ता हैं बनाना,
तस्वीर बसा रक्खी है दिल में तुम्हारी
ख़्वाब कोई,आँखों में हमको क्या सजाना,
जिस दौर में,रिश्ते नाते, सब मतलबी हों
मुश्किल से मिलता है अच्छा दोस्ताना,
ख़ैरात नहीं होतीं साँसे ज़िन्दगी में
कर्ज़-ए-जीस्त, सबको पड़ता है चुकाना,
कर्ज़ ए जीस्त=ज़िन्दजी का कर्जा।
[3:06 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर
83
: वैभव बेख़बर
दुनियां के इस मेले में, तुम क्यों उलझे सचकारों में
बिकते देखे हैं हमनें, ईमान यहाँ बाज़ारों में,
आदम खोर हुआ है इन्सां, वक़्त ये कैसा आया है
कत्लेआम दिखे, लूट छपी,अक्सर इन अख़बारों में
ये मुल्क़ किसी के बाबा दादा की ,ज़ागीर नहीं है
हाँ आते जाते रहते हैं, लोग यहां सरकारों में,
क़ुर्बान हुए, जो वीर यहाँ, फ़र्ज़ वतन पूरा करते
नाम गये लिक्खे, उनके अक्सर शाही दीवारों में,
देखते देखते टूट गए, कुछ साहिल पर बैठे बैठे
करने पार समन्दर,कुछ लाये कश्ती , मझधारों में।
[3:06 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
84
22 2 2 22 212
पतवारों पर छायीं मस्तियाँ
डूब रहीं,साहिल पर कश्तियाँ
मीनार बनी जब सरकार की
मज़लूमों की, उजडीं बस्तियाँ
आप नहीं,सच बोले,इसलिए
झूठ बटोर, रहा है सुर्खियां
जबआया,अपनी जिदपर हुनर
तोड़ गया, लोहे की रस्सियाँ
तब ,हर मौसम होगा, रु-ब-रु
जब कमरें में होंगी,खिड़कियाँ
[3:07 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
85
122 22 22 22 21
वैभव बेख़बर
मुक़द्दर का,पत्थर ढोते हैं लोग
बहुत फुटपाथों पर सोते हैं लोग
हमें आपस में लड़वायेंगे सिर्फ़
सियासी, सत्ता के भूखे हैं लोग
मुहब्बत को,खेल समझते हैं यार
यहाँ कुछ ऐसे भी, होते हैं लोग
बुलाते हैं,बस माता कहकर,और
बुराई ,गंगा में, धोते हैं लोग
करेंगें, हिन्दू-मुस्लिम वाली बात
यहां कुछ नफ़रत भी,बोते हैं लोग।
[3:07 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
बाद में, गीता औ कुरान रखना
मुल्क़ का पहले संविधान रखना,
घर दिखाई देता रहे, जहाँ से
सिर्फ इतनी ऊँची, उड़ान रखना
इस ज़माने में, ठीक भी नहीं है
देर तक,खुद को,बेज़ुबान रखना
अब निग़ाहों से ,वार हो रहे हैं
छोड़ दे,सब तीरो-कमान रखना
देखकर,सूरज चाँद,मत बहकना
पांव के ,नीचे आसमान रखना।
[3:07 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर
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: ( ग़ज़ल ) वैभव बेख़बर
22 22 22 22 12 12 22
रोटी की ख़ातिर, कुछ बाज़ार में उतर आए
नाबालिक बच्चे, कारोबार में उतर आए
बात करेंगे संसद में, जातिवाद,मज़हब की
दंगाई लोग, जहां सरकार में उतर आए
क़ातिल भी घबराया,क़त्ल करके दिवाने का
सब दर्दे-दिल उसकी तलवार में उतर आये
आँखे भी हैरान हुईं, देख इस अचम्भे को
लोग फ़रेबी, सच के क़िरदार में उतर आए
सैलाबों से टकराने, आज इस समन्दर में
हम तो कश्ती लेकर,मझधार में उतर आए।
वैभव बेख़बर
88
[3:07 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
याद करता बेवज़ह ख़याल करता है
दर्द दिल को,इस कदर हलाल करता है
खेल है सारा यहां ,महज़ मुक़द्दर का
कुछ नहीं करता,वोभी कमाल करता है
कर्मचारी अब वहाँ के घूस खाते हैं
काम सरकारी जहाँ,दलाल करता है
कुछ तुम्हीं आकर,इसे ज़बाब दे जाओ
दिल बहुत से ,बेवज़ह सवाल करता है
लौटकर आता नहीं , गुज़र गया है जो
बेख़बर क्यों ,इस तरह मलाल करता है।
[3:08 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
यहां प्यास में मुरझाये हैं शज़र कई
और कहीं,बारिस में डूब गए,घर कई
बेबसी में दब गई, उड़ने की तमन्ना
ज़ालिम पिंज़रों ने,कतर दिए पर कई
दिल छूने वाली ,कोई बात नहीं होती
इन आँखों में तो आते हैं मन्ज़र कई
बहुत सोच समझके,रास्ते चुनने होंगें
मन्ज़िल से भटकाते हैं सफ़र कई
चोंट खाके,इक दो शायर बन जाते हैं
यहां इश्क में बर्बाद हुए हैं हुनर कई
पास तुम्हारे ,एक टूटा फूटा घर तो है
लोग फुटपाथों पे ,करते हैं,बसर कई।
[3:08 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
90
3/08/2019 वैभव बेख़बर
ये कब तक जंग,चलाएंगे हम दोनों
लड़ते लड़ते मर ,जायेंगे हम दोनों
सिर्फ़ सियासत होती , सत्ता पाने को
हिन्दू-मुस्लिम बन, जाएंगे हम दोनों
रस्ते दुशवार मिलेंगे, मिलजुल कर चल
चलते चलते ,थक जाएंगे हम दोनों
इश्क़ अग़र जारी रक्खा , सच्चाई से
अपनी मन्ज़िल तक, जाएंगे हम दोनों
आओ मिलकर ,एक यहां,आगाज़ करें
इतिहास नया, रच जाएंगे हम दोनों।
[3:08 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
टूटते देखे हमनें , गुमान कई
ज़िन्दगी लेती है इम्तिहान कई
मत करो,अफवाहों पर यकीन यहां
फ़ासले बन जाते ,दरमियान कई
बनगया,सच मुज़रिम,और कैद हुआ
थे अदालत ,में झूठे बयान कई
दुश्मनी ,का है अंज़ाम सिर्फ़ बुरा
हो गये, घर धरती पर, विरान कई
रोज़ की,लहरों से, देख साहिल पर
बेख़बर,बन जाते हैं निशान कई।
[3:08 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
अपनी हर कमीं , देखनी होगी
जाकर तब कहीं रौशनी होगी
रहबर, बन गए हैं, यहां रहज़न
मन्ज़िल खुद तुम्हें ,ढूंढनी होगी
रहबर=पथप्रदर्शक,
रहज़न =राह का लुटेरें
नाकस,जातिवाद मज़हब की अब
हर इक गन्दगी फेंकनी होगी
नाकस=घटिया
थोड़ी देर में टूट जा येंगे
आपस में,अगर दुश्मनी होगी
यूँ हासिल, बुलन्दी , नहीं होती
हर आदत बुरी , छोड़नी होगी
इन्ही रास्तों पर , चलेगा सच
गति,अब झूठ की ,रोकनी होगी।
[3:08 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
ज़मीनी बात पर ,झगड़े, निशां देखे हैं
यहां उजड़े बहुत हमने , मकां देखे हैं
ज़बाने काट लीं, जिसने यहां सच बोला
बहुत से लोग, हमने बे-ज़ुबां देखें हैं
पता कुछ भी नहीं, माहौल व्यवस्था का
सियासी भक्त ,ज़ाहिल से, यहां देखें हैं
अँधेरा ही नज़र आया ,जहां तक देखा
न घर जलते, ग़रीबों के , समां देखें हैं
मिटाये जा, रहे हैं शरहदों पर सैनिक
सियासत का शिकार हुए जवां देखे हैं।
[3:09 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
फूल से ज़्यादा पतझड़, ख़ार देखा है
जीवन का हमने विस्तार देखा है
दौर बनावट का,है आदमी में, अब
अन्दर कुछ, बाहर किरदार देखा है
अब क्या जाना,होकर इस समन्दर से
साहिल बन्जर ही ,उस पार देखा है
समझाओ मत,अच्छा,क्या बुरा क्या है
हमनें ये सारा , बाज़ार देखा है
दौलत की दुनियां में, इश्क़ के जरिये
होता जिस्मी कारोबार देखा है।
[3:09 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
पतवार ,लहर सिर्फ तमाशा है
कश्ती , कोई और बहाता है
दिल उजड़ा वीरान शहर है इक
कोई आता ,न जहाँ, जाता है
एक हुनर, ही सिर्फ यहाँ सच है
झूठा ,सबका भाग्य विधाता है
अपनों की,ख़ातिर,ख़ामोश रहा
चिल्लाना, तो हमें ,भी आता है
हार जहाँ, तय है, पहले ,से ही
ये जीवन,इक खेल ,जुआ सा है
प्यार मुहब्बत, रिश्ते,धन-दौलत
अब मतलब,सब काम चलाता है।
[3:09 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
मज़दूरी की तब चार दाने आये
अपने हिस्से में कब ख़ज़ाने आये
घर वालों की चिन्ता बनी रहती है
जब से परदेश में हम कमाने आये
रोते रोते दिल हो गया पत्थर सा
आँसू तब आखों को छुपाने आये
मझधारों से मंज़ूर था, होता जो
साहिल पर लोग हमें डुबाने आये
कुछ समता और विकास की बातें कर
संसद तक नेता सब कमाने आये
[3:09 PM, 8/12/2019] वैभव बेख़बर:
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वैभव बेख़बर
अक्सर दुश्मन केलिये दुशवार सा रहा
मेरा तीर हमेशा तलवार सा रहा
मझधार बने, लोग यहाँ कुछ दिवार थे
सिर्फ हुनर ही अक्सर पतवार सा रहा
शख्स जो,धोखा देकर,हमको चला गया
कुछ उस पर भी, मुदतों एतबार सा रहा
तुम झूठ रहे सुनते, ख़ामोश भी रहे
सच इस ज़ुर्म में, यार गुनहगार सा रहा
आँखें ,उनकी आँखों से,जा लड़ी युहीं
फिर रोज़ कई, दिल ये, बीमार सा रहा
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